अक्तूबर 30, 2018

धन

कोई दस साल हुए, मैं जयपुर में मेहमान था। एक सभा में बोलता था। एक बूढ़ा आदमी मेरे बोलने के बाद उठा, कोई पिछहत्तर वर्ष उम्र होगी। हाथ कंपते हैं और उसने आकर मेरे पास, होंगे पांच-छह हजार रुपये के नोट, वह मेरे पास रख दिए और मुझे नमस्कार किया। मैंने उस बूढ़े आदमी को कहा कि आपका नमस्कार स्वीकार कर लेता हूं, रुपये की अभी जरूरत नहीं है, कभी पड़ सकती है, जब पड़ेगी जरूरत तब आपको निवेदन करूंगा। अभी रुपये रख लें। मुझे खयाल न था कि यह परिणाम होगा। आशा भी नहीं थी क्योंकि ऐसे आदमी मिलने मुश्किल होते हैं। उस आदमी को मैंने चुपचाप खड़े पाया, वह कुछ भी नहीं बोला तो मैंने ऊपर आंखें उठा कर देखा तो बूढ़े की आंख से आंसू बहे जा रहे हैं। मैं बहुत घबड़ाया, मैंने हिलाया कि क्या हो गया, आप दुखी हो गए, माफ करें, दुख मैंने दिया हो तो। उन्होंने कहाः दुख बहुत दे दिया, क्योंकि मैं बहुत गरीब आदमी हूं, मेरे पास सिवाय इन रुपयों के और कुछ भी देने को नहीं है। और कुछ देने का मन हो गया है आपको, और मेरे पास सिवाय रुपये के और कुछ है ही नहीं, इतना गरीब आदमी हूं। और जब कोई मेरे रुपये को इनकार कर देता है तो एकदम इंपोटेंट, एकदम नपुंसक हो जाता हूं। मेरे पास और कुछ भी नहीं। पत्नी को देने को मेरे पास प्रेम नहीं है, सिर्फ गहने दे सकता हूं। बेटों को देने के लिए मेरे पास ज्ञान नहीं है, सिर्फ रुपये दे सकता हूं। मित्रों को देने के लिए मेरे पास मित्रता नहीं है। मेरे पास कुछ भी नहीं है सिवाय इन रुपयों के। क्योंकि मैंने सारी जिंदगी रुपये में लगा दी और यह सोचा था जिंदगी की शुरुआत में कि रुपया सब कुछ है, और अब मैं जानता हूं कि रुपया इकट्ठा हो गया है, और मैं ना-कुछ हो गया हूं। ये रुपये उठा कर आप बाहर फेंक दें, लेकिन मुझे वापस मत करें। मेरे पास और कुछ भी नहीं है।

उस बूढ़े आदमी की आंखों में झांक कर मुझे पहली बार पता चला कि धन का संग्रह किसी आदमी को धनी नहीं बना सकता। वह तो भ्रम हमारा इसलिए नहीं टूटता क्योंकि कभी धन इकट्ठा ही नहीं हो पाता। इसलिए भ्रम जारी रहता है। या कभी इकट्ठा भी हो जाता है, तो हमसे आगे और लोग होते हैं, जिनके पास ज्यादा होता है, भ्रम जारी रहता है। किसी भी आदमी को सारी दुनिया की दौलत दे दो, वह उसी दिन संन्यासी होना चाहेगा, वह उसके बाद एक क्षण नहीं रुक सकता। वह तो दुर्भाग्य यह है कि दौलत सबको नहीं मिल पाती इसलिए आदमी दौलत से बंधा रह जाता है। धन नहीं मिल पाता इस लिए आदमी धन से बंधा रह जाता है। और गरीबी मैं मिटाने की बातें करता हूं, इसलिए नहीं कि गरीबी बहुत बुुरी है, गरीबी मिटाने की बातें करता हूं क्योंकि गरीब को धन नहीं मिल पाता और धन की आकांक्षा सदा शेष रह जाती है। धन की आकांक्षा बड़ी बीमारी है। दुनिया से गरीबी मिट जाए और इतना धन मिल जाए लोगों को कि धन की व्यर्थता दिख जाए, तो धन की दौड़ कम हो जाए। दुनिया जिस दिन समृद्ध होगी, उसी दिन धन की दौड़ मिटेगी, उससे पहले नहीं मिट सकती।

नानक दुखिया सब संसार👣ओशो



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