अक्तूबर 17, 2018

भारत धर्मनिरपेक्ष कैसे?

परिवार-नियोजन पर ओशो 🌷❤
मैं अभी एक घटना पढ़ रहा था।
एक अमेरिकी विचारक ने लिखा है कि इस वक्‍त सारी दुनिया में जितने डाक्‍टर परिवार-नियोजन में सहयोगी हो सकते है, अगर वे सब के सब एशिया में लगा दिए जायें,और वे बिलकुल न सोएं, सुबह से लेकर दूसरी सुबह तक आपरेशंस करते रहें, तो भी उन्‍हें एशिया को उस स्‍थिति में लाने के लिए, जहां जनसंख्‍या सीमा में आ जाय, पाँच सौ वर्ष लगेंगे। और पाँच सौ वर्ष में तो हमने इतने बच्‍चे पैदा कर लिए होंगे जिसका कोई हिसाब नहीं रह जायेगा।
ये दोनों संभावनाएं नहीं है। सारी दुनिया के सभी डाक्‍टर एशिया में लाकर लगाये नहीं जा सकते। और लगा भी दिए जाएँ तो पाँच सौ वर्षों में यह संभावना अगर हो पाए, तो पाँच सौ वर्ष में हम खाली थोड़े ही बैठे रहेंगे, हम प्रतीक्षा थोड़े ही करते रहेंगे पाँच सौ वर्षों तक कि जब आपके पांच सौ वर्ष पूरे हो जाएं तब तक हम चुप बैठे रहें। पाँच सौ वर्षों में तो हम जाने क्‍या कर डालेंगे।

नहीं, यह संभव नहीं मालूम होता। समझाने बुझाने के प्रयोग से तो सफलता दिखाई नहीं पड़ता है। संतति नियमन तो अनिवार्य करना होगा।
और यह अलोकतांत्रिक नहीं है। हम हत्या को अनिवार्य किए हुए है कि कोई हत्या नहीं कर सकता। यह अलोकतांत्रिक नहीं है। हम कहते है कि कोई किसी आदमी को हत्या का हक़ नहीं है। लेकिन यह डेमोक्रेसी के खिलाफ नहीं है।
अभी मैं अहमदाबाद में बोल रहा था तो मुझे कई पत्र आए कि आप कहते है अनिवार्य कर दें संतति-नियमन! तो यह तो लोकतंत्र का विरोध है।
मैंने उनको कहा कि एक आदमी की हत्‍या करने से जितना नुकसान होता है, आज उससे हजार गुना ज्यादा नुकसान एक बच्‍चे को पैदा करने से होता है। एक आदमी आत्‍महत्‍या कर लेता है उससे जितना नुकसान होता है, उतना एक आदमी एक बच्चे को पैदा करता है उससे हजार गुना नुकसान होता है।
संतति नियमन तो अनिवार्य होना चाहिए। तब गरीब और अमीर और बुद्धिमान और गैर बुद्धिमान का सवाल नहीं रह जाता। तब हिन्‍दू, मुसलमान और ईसाई का सवाल नहीं रह जाता।
यह देश बड़ा अजीब है, हम कहते है कि हम धर्म-निरपेक्ष है, और फिर भी सब चीजों में धर्म का विचार करते है। सरकार भी विचार रखती है। ‘हिन्‍दू कोड बिल’ बना हुआ है, वह सिर्फ हिन्‍दू स्‍त्रियों पर ही लागू होता है। यह बड़ी अजीब बात है। सरकार जब धर्म-निरपेक्ष है तो मुसलमान स्‍त्रियों को अलग करके सोचे, यह बात ही गलत है। सरकार को सोचना चाहिए स्‍त्रियों के संबंध में। मुसलमान को हक है कि वह चार शादियाँ करे, किन्‍तु हिन्‍दू को हक नहीं है। तो मानना क्‍या होगा? यह धर्म-निरपेक्ष राज्‍य कैसे हुआ? हिन्‍दुओं के लिए अलग नियम और मुसलमान के लिए अलग नियम नहीं होना चाहिए।
नहीं, सरकार को सोचना चाहिए -‘स्‍त्री‘ के लिए क्‍या उचित है? क्या यह उचित है कि चार स्‍त्रियां एक आदमी की पत्‍नी बने? वह हिन्‍दू हो या मुसलमान, यह इररेलेवेंट है, यह असंगत है, इसमें कोई संबंध नहीं है। चार स्त्रियां एक आदमी की पत्नियाँ बने, यह बात ही अमानवीय है। इसमें सवाल नहीं है कौन हिन्‍दू है और कौन मुसलमान है। यह अपनी-अपनी इच्‍छा की बात है।
फिर कल हम यह भी कह सकते है कि मुसलमान को हत्‍या करने में थोड़ी सुविधा देनी चाहिए। ईसाई को थोड़ी या हिन्‍दू को थोड़ी सुविधा देनी चाहिए हत्‍या करने में।
नहीं, हमें व्‍यक्‍ति और आदमी को सोच कर विचार की जरूरत है। अनिवार्य होना चाहिए। यह सवाल मुल्‍क का है, पूरे मुल्क का है। इसमें हिन्‍दू, मुसलमान और ईसाई अलग नहीं किये जा सकते। उसमें अमीर और गरीब अलग नहीं किए जा सकते।
🌷❤संभोग से समाधि की ओर🌷❤ ओशो