नवंबर 13, 2018

पूरी होनी चाहिए

ओशो...

मैं अहमदाबाद में था। एक मित्र संन्यास लेने आए। जब मैं किसी को संन्यास देता हूं तो उससे कहता हूं, ज़रा मेरी आंखों की तरफ देखो। उनसे मैंने बार-बार कहा लेकिन वे नीचे ही देखें।

मैंने कहा : भई एक दफा मेरी आंख की तरफ तो देखो। उन्होंने कहा कि नहीं देखेंगे। मैंने कहा : तुम एक नए संन्यासी हो! बात क्या है?

उन्होंने कहा : शर्म आती है। लज्जा आती है।
तो मैंने कहा : फिर पूरी कहानी कहो। बात क्या है पीछे? तो उन्होंने कहा : आपको पता चल गया क्या? मैंने कहा : तुम पूरी कहानी कहो। तुम्हारे चेहरे पर तो लिखी है।

तब उन्होंने आंख उठाई। उन्होंने कहा कि बात असल में यह है ? ?

उन दिनों मुझ पर अहमदाबाद की अदालत में एक मुकदमा चलता था। किसी ने मुकदमा चला दिया था कि मैं धर्म का दुश्मन हूं और धर्म की हानि हो रही है। उन सज्जन को बड़ा जोश आ गया। धर्म की हानि हो रही है! ? ? तो वे मेरी सभा में छुरा लेकर छुरा फेंक कर मुझे मारने को आए थे।

मगर भीड़-भाड़  थी और इतने पास नहीं आ सके जहां से छुरा फेंका जा सके, तो उन्होंने सोचा कि अब    आ ही गया  हूं तो बैठकर सुन लूं।

बैठकर सुन तो लिया , लेकिन तब बड़ी ग्लानि  से भर गए  कि  अगर यह बात धर्म की हानि है, तो फिर  धर्म की रक्षा क्या होगी! दूसरे  दिन संन्यास लेने आए। तो उन्होंने कहाः  इसलिए आंख नहीं उठाता हूं कि कल ही तो मैं छुरा लेकर आपको मारने गया था। आंख किस तरह उठाउं ?

मैंने कहा : तुम बेफिक्री से उठाओ। तुम्हारा मुझसे नाता पुराना होगा, नया नहीं है। तो सिर्फ अफवाह सुनकर कोई किसी को छुरा मारने जाए, अपनी जिंदगी दांव पर लगाए . . .।


मेरी जिंदगी जाती-जाती, वह तो ठीक था; तुमने अपनी जिंदगी दांव पर लगायी, यह कोई छोटा मामला है! तुम फंसते, झंझट में पड़ते। इतनी झंझट में पड़ना चाहा जिस आदमी के लिए तुमने . . . जीवन-मरण का सवाल तुम्हारे लिए भी था।

जितनी तुमने उपद्रव उठाने की हिम्मत दिखाई, साफ जाहिर है कि नाता पुराना होगा। और घृणा जल्दी ही प्रेम में बदल जाती है। असली कठिनाई तो उन लोगों के साथ है जिनकी घृणा भी बड़ी कुनकुनी है।

कुनकुना प्रेम भी कहीं नहीं पहुंचाता, कुनकुनी घृणा भी कहीं नहीं पहुंचाती। या तो प्रेम चाहिए जलता हुआ, ज्वलंत, सौ डिग्री पर; या घृणा चाहिए ज्वलंत, सौ डिग्री पर। दोनों ही हालत में कुछ क्रांति घटती है।

ज्‍योति से ज्‍योति जले-(सूंदर दास)--प्रवचन-18


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