नवंबर 11, 2018

योगयुक्त

मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन की दो पत्नियां थीं। और निश्चित ही, दो पत्नियां जिसकी होती हैं, वह जानता है कि उसकी क्या मुसीबत हो सकती है! एक पत्नी में आप हजार का गुणा कर लें, दो का नहीं। क्योंकि जब दो पत्नियां होती हैं, तो जोड़ नहीं होता, गुणनफल होता है। बड़ी मुसीबत में था और निरंतर यह विवाद था, दोनों पत्नियां आमने-सामने पूछ लेती थीं उससे, कि बोलो, हम दोनों में सुंदर कौन है? मुल्ला नसरुद्दीन कहता था, तुम दोनों एक-दूसरे से ज्यादा सुंदर हो!

लेकिन पत्नियों को शक था कि वह किसी की तरफ ज्यादा झुका हुआ होगा ही। दो स्त्रियां मान ही नहीं सकतीं कि उनके बीच में कोई पुरुष खड़ा हो, तो वह जरा-सा कहीं ज्यादा झुका हुआ नहीं होगा। और ऐसे सौ में निन्यानबे मौके पर यह बात सच भी है। उनका शक काफी दूर तक सही है। हम बीच में खड़े हो ही नहीं सकते।

पहली पत्नी की मृत्यु हुई, तो उसने कहा कि जिंदगी में जो हुआ हुआ, लेकिन एक बात का वायदा कर दो कि मरने के बाद दोनों पत्नियों की तुम कब्र बनाना और अपनी कब्र बिलकुल ठीक बीच में बनाना, जस्ट राइट इन दि मिडिल। क्योंकि जिंदगी में जो हुआ हुआ; लेकिन मरने के बाद कयामत तक मैं कब्र में परेशान नहीं होना चाहती कि तुम जरा उस तरफ झुके हुए हो। बिलकुल ठीक ज्यामिति के हिसाब से, गणित के हिसाब से साफ कर लेना। नसरुद्दीन ने वायदा किया।

दूसरी पत्नी का भी आग्रह यही था। कभी नसरुद्दीन ने बताया नहीं। पहली पत्नी का नाम था फातिमा, दूसरी पत्नी का नाम था सुलाना। उसका मन सदा दूसरी की तरफ थोड़ा झुका हुआ था, लेकिन यह कहने की हिम्मत उसे कभी जुटी नहीं।

दोनों मर गईं, तो नसरुद्दीन ने अपने कब्र  बनाने वाले को कहा कि बिलकुल ठीक बीच में बनाना मेरी कब्र, लेकिन जरा-सी झुकी हुई सुलाना की तरफ; जरा-सी, जस्ट ए बिट लीनिग टुवर्ड्स सुलाना। बनाना बीच में, लेकिन जरा तिरछी बनाना, झुकी हुई! लेकिन कब्र बनाने वाले ने कहा कि तुम्हारी दोनों पत्नियों की वसीयत में लिखा हुआ है, ठीक बीच में होनी चाहिए। और दो मृत आत्माओं को मैं कष्ट नहीं देना चाहूंगा। और फिर कौन झंझट में पड़े तुम्हारी। तो मैं किसी झंझट में पीछे नहीं पड़ना चाहता हूं। मैं तो ठीक बीच में बना दूंगा। मैं झुकी हुई नहीं बना सकता।

तो मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, तो फिर ऐसा करना कि मुझे करवट लेकर भीतर लिटा देना, सुलाना की तरफ करवट लेकर; सीधा मत लिटाना!

बीच में होना बड़ा कठिन है। रस हमारा चुनाव करना चाहता है। अगर हम परमात्मा को भी चुनते हैं, तो संसार के खिलाफ। लेकिन जो आदमी संसार के खिलाफ परमात्मा को चुनता है, वह परमात्मा को चुनता ही नहीं। क्योंकि परमात्मा को केवल वही चुन सकता है, जिसने सब चुनाव छोड़ दिए, च्वाइसलेस हो गया, जिसका कोई चुनाव नहीं है। जो कहता है, संसार भी मेरे लिए परमात्मा है; जो कहता है, परमात्मा भी मेरे लिए संसार है; अब मुझे कुछ फर्क न रही। जो कहता है, जीवन मुझे मृत्यु है, मृत्यु मुझे जीवन है। जो कहता है, धन भी मेरे लिए निर्धनता है, और निर्धनता भी मेरे लिए धन है। ऐसा व्यक्ति ही ठीक मध्य में खड़ा होता है। और ऐसे मध्य में खड़े व्यक्ति का नाम ही योग-युक्त है।

योग-युक्त का अर्थ है, पूर्ण रूप से संतुलित हो गया जो। जैसे कि तराजू का काटा बीच में खड़ा हो जाए और दोनों पलड़े बराबर हों, जरा भी यहां-वहां झुके हुए नहीं। जब तराजू का काटा ठीक बीच में होता है, तो योग-युक्त होता है। ऐसे ही जब आपका चित्त ठीक बीच में होता है, तो योग-युक्त होता है।
जीवन के समस्त विरोधों में मध्य में खड़े हो जाने का नाम योग है। जीवन की समस्त विपरीतताओ में अचुनाव का नाम योग-युक्त होना है।

इसलिए हम कृष्ण को महायोगी कह सके। महायोगी कहने का कारण है, और वह कारण यह है कि कृष्ण शायद पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने दोनों अतियों के बीच में-ठीक बीच में-खड़े होने की व्यवस्था दी है। अगर हम ठीक बीच में भी खड़े हों, तो थोड़ा-सा मन डांवाडोल होता है। अगर हम बीच में भी खड़े हों, तो हम इसीलिए खड़े होना चाहते हैं कि संसार से कैसे मुक्त हो जाएं! अगर संसार से कैसे मुक्त हो जाएं, यही भीतर लगा हुआ है, तो आप थोड़े-से झुके हुए खड़े होंगे, बीच में खड़े नहीं हो सकते हैं।

इसलिए कृष्ण का जीवन बहुत अदभुत है। कृष्ण का जीवन उन थोड़े-से जीवन में से एक है, जो संसार के विरोध में नहीं हैं। कृष्ण का जीवन विरागी का जीवन नहीं है, और कृष्ण का जीवन रागी का जीवन भी नहीं है। और कृष्ण वहीं खड़े हैं, जहां सब रागी खडे रहते हैं। और कृष्ण ऐसे खड़े हैं, जैसे विरागी खड़े रहते हैं। कृष्ण का जीवन, दो विपरीत के बीच मध्य की खोज है। इतना मध्यस्थ व्यक्ति पृथ्वी पर शायद ठीक दूसरा नहीं हुआ।

हम तो आमतौर से कहेंगे कि अगर कृष्ण शांतिवादी हैं, तो युद्ध में कदम नहीं रखना चाहिए। और अगर युद्धवादी हैं, तो फिर परमात्मा और दिव्यता और ब्रह्म, इनकी बात नहीं करनी चाहिए। दो में से कुछ एक साफ चुन लो।

हम तो कहते हैं, अगर कृष्ण कहते हैं, अनासक्ति ही जीवन का सूत्र है, तो यह गोपियों के बीच नृत्य इनकसिस्टेंट है, असंगत है। यह नहीं चलना चाहिए। यह बंद होना चाहिए। और अगर यह गोपियों के बीच नृत्य ही चलना है और यह बांसुरी ही बजनी है, और यह मोर-मुकुट बांधकर नाचना ही है, तो फिर अनासक्ति और योग और समाधि और ब्रह्म, इसकी चर्चा बंद कर देनी चाहिए। दो में से कुछ साफ चुन लो।

और कृष्ण कहते हैं, हम चुनेंगे ही नहीं। इसलिए कृष्ण बहुत बेबूझ हैं, बहुत रहस्यमय हैं। गणित की तरह साफ-सुथरे नहीं हैं, काव्य की तरह रहस्यमय हैं। तर्क की तरह कटे-बंटे नहीं हैं, प्रेम की तरह बहुत रहस्यपूर्ण हैं। दोनों हैं एक साथ। और दोनों नहीं हैं। योग-युक्त होने का यही अर्थ है।

ओशो 👣 गीता दर्शन


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