नवंबर 11, 2018

प्रेम

*प्रेम/ईर्ष्या*

मैंने सुना है, एक सत्ताईस मंजिल वाले बड़े मकान में मुल्ला नसरुद्दीन लिफ्ट से ऊपर जा रहा है। लिफ्ट में बड़ी भीड़ थी। और जब दूसरी मंजिल पर मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी ने प्रवेश किया तो भीड़ और भी बढ़ गई। और फिर चौथी मंजिल पर एक अति सुंदर युवती प्रविष्ट हुई तो जगह बिलकुल न बची। युवती मुल्ला और उसकी पत्नी के बीच किसी तरह सिकुड़ कर खड़ी हो गई। लिफ्ट ऊपर उठने लगी, लेकिन मुल्ला की पत्नी अति बेचैन होने लगी। सत्ताईस मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते...। और मुल्ला इतना सट कर खड़ा है उस युवती से और युवती भी सट कर खड़ी है और अब कहने का कुछ उपाय भी नहीं है, क्योंकि जगह ही नहीं है। बेचैनी और भी बढ़ने लगी क्योंकि मुल्ला अत्यंत गदगद है। मुल्ला का सुख! मुल्ला तो जैसे स्वर्ग में है! और मुल्ला बार-बार लार टपकती मुख-मुद्रा से युवती को निहार भी लेता है। फिर अचानक युवती ने चीख मारी और मुल्ला के मुंह पर जोर का तमाचा रसीद कर दिया। वह चिल्लाई: "खूसट बुङ्ढे! तुम्हारा इतना साहस! च्यूंटी लेने का साहस!'
लिफ्ट में सन्नाटा हो गया। अगली मंजिल पर मुल्ला अपना चेहरा सहलाता हुआ पत्नी के साथ लिफ्ट से उतरा। लिफ्ट के बाहर उसकी बोलती लौटी। वह बोला, "मैं समझा नहीं कि हुआ क्या! मैंने च्यूंटी ली ही न थी।' "मुझे मालूम है', पत्नी ने अत्यंत प्रसन्नता से गदगद होते हुए कहा, "च्यूंटी मैंने ली थी।' ऐसे ही तुम्हारे सब प्रेम के संबंध हैं। एक-दूसरे पर पहरा है। एक-दूसरे के साथ दुश्मनी है, प्रेम कहां! प्रेम में पहरा कहां? प्रेम में भरोसा होता है। प्रेम में एक आस्था होती है। प्रेम में एक अपूर्व श्रद्धा होती है। ये तो सब प्रेम के ही फूल हैं--श्रद्धा, भरोसा, विश्वास। प्रेमी अगर विश्वास न कर सके, श्रद्धा न कर सके, भरोसा न कर सके, तो प्रेम में फूल खिले ही नहीं।र् ईष्या, जलन, वैमनस्य, द्वेष, मत्सर तो घृणा के फूल हैं। तो फूल तो तुम घृणा के लिए हो और सोचते हो प्रेम का पौधा लगाया है। नीम के कड़वे फल लगते हैं तुममें और सोचते हो आम का पौधा लगाया है। इस भ्रांति को तोड़ो। इसलिए जब मैं तुमसे कहता हूं कि प्रेम परमात्मा तक जाने का मार्ग बन सकता है तो तुम मेरी बात को सुन तो लेते हो, लेकिन भरोसा नहीं आता। क्योंकि तुम प्रेम को भलीभांति जानते हो। उसी प्रेम के कारण तुम्हारा जीवन नरक में पड़ा है। अगर मैं इसी प्रेम की बात कर रहा हूं तो निश्चित ही मैं गलत बात कर रहा हूं। मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूं--उस प्रेम की, जिसकी तुम तलाश कर रहे हो, लेकिन जो तुम्हें अभी तक मिला नहीं है। मिल सकता है, तुम्हारी संभावना है। और जब तक न मिलेगा तब तक तुम रोओगे, तड़पोगे, परेशान होओगे। जब तक तुम्हारे जीवन का फूल न खिले और जीवन के फूल में प्रेम की सुगंध न उठे, तब तक तुम बेचैन रहोगे। अतृप्त! तब तक तुम कुछ भी करो, तुम्हें राहत न आएगी, चैन न आएगा। खिले बिना आप्तकाम न हो सकोगे। प्रेम तो फूल है।

*ओशो*

*जगत तरैया भोर की*


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