नवंबर 18, 2018

जीने के लिए खायें न कि खाने के लिए जीयें

ध्यानी का आहार

मनुष्य एक अकेली प्रजाति है जिसका आहार अनिश्चित है। अन्य सभी जानवरों का आहार निश्चित है। उनकी बुनियादी शारीरिक जरूरतें और उनका स्वभाव फैसला करता है के वे क्या खाते हैं और क्या नहीं; कब वे खाते हैं और कब उन्हें नहीं खाना होता है। किन्तु मनुष्य का व्यवहार बिलकुल अप्रत्याशित है, वह बिल्कुल अनिश्चितता में जीता है। न ही तो उसकी प्रकृति उसे बताती है कि उसे कब खाना चाहिए, न उसकी जागरूकता बताती है कि कितना खाना चाहिए, और न ही उसकी समझ फैसला कर पाती है कि उसे कब खाना बंद करना है|

अब जब इनमे से कोई भी गुण निश्चित नहीं है तो मनुष्य का जीवन बड़ी अनिश्चित दिशा में चला गया है। लेकिन अगर मनुष्य थोड़ी सी भी समझदारी दिखाए, अगर थोड़ी सी बुद्धि से जीने लगे, थोड़ी सी विचारशीलता के साथ, थोड़ी सी अपनी आँखें खोल ले, तो सही आहार का निर्णय लेना बिलकुल कठिन नहीं होगा. यह बहुत आसन है; इससे आसन कुछ हो भी नहीं सकता। सही आहार को समझने के लिए हम इसे दो हिस्सों में बाँट सकते हैं।

पहली बात: मनुष्य क्या खाए और क्या न खाए?

मनुष्य का शरीर रासायनिक तत्वों से बना है, शरीर की पूरी प्रक्रिया रासायनिक है। अगर मनुष्य के शरीर में शराब डाल दी जाये, तो उसका शरीर पूरी तरह उस रसायन के प्रभाव में आ जायेगा; यह नशे के प्रभाव में आ कर बेहोश हो जायेगा। कितना भी स्वस्थ, कितना भी शांत मनुष्य क्यों न हो, नशे का रसायन उसके शरीर को प्रभावित करेगा। कोई मनुष्य कितना भी पुण्यात्मा क्यों न हो, अगर उसे जहर दिया जाये तो वह मारा जायेगा।

कोई भी भोजन जो मनुष्य को किसी तरह की बेहोशी, उत्तेजना, चरम अवस्था, या किसी भी तरह की अशांति में ले जाए, हानिकारक है। और सबसे गहरी, परम हानि तब होती है जब ये चीजें नाभि तक पहुंचने लगती हैं।

शायद तुम नहीं जानते की पूरी दुनिया की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों में शरीर को स्वस्थ करने के लिए गीली मिट्टी, शाकाहारी भोजन, हलके भोजन, गीली पट्टीयों और बड़े टब में स्नान का प्रयोग किया जाता है। लेकिन अब तक कोई प्राकृतिक चिकित्सक यह नहीं समझ पाया है कि गीली पट्टीयों, गीली मिट्टी, टब में स्नान का जो इतना लाभ मिलता है, वह इनके विशेष गुणों के कारण नहीं बल्कि नाभि केंद्र पर इनके प्रभाव के कारण है। नाभि केंद्र पुरे शरीर पर प्रभाव डालता है। ये सारी चीजें जैसे मिट्टी, पानी, टब स्नान नाभि केंद्र की निष्क्रिय ऊर्जा पर प्रभाव डालती हैं, और जब ये उर्जा सक्रिय होनी शुरु होती है तो मनुष्य स्वस्थ होने लगता है।

लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा अभी यह बात नहीं जान पाई है। प्राकृतिक चिकित्सक सोचते हैं कि शायद ये स्वास्थ्य लाभ गीली मिट्टी, टब में स्नान, या गीली पट्टीयों को पेट पर रखने के कारण हैं। इन सब से भी लाभ होता है, परन्तु वास्तविक लाभ नाभि केंद्र कि निष्क्रिय ऊर्जा के सक्रिय होने से होता है।

अगर नाभि के साथ गलत व्यवहार किया जाये, अगर गलत आहार, गलत भोजन किया जाये, तो धीरे धीरे नाभि केंद्र निष्क्रिय पड़ जाता है और इसकी उर्जा घटने लगती है। धीरे-धीरे नाभि केंद्र सुस्त पड़ने लगता है, आखिर में यह लगभग सो जाता है। तब हम इसे एक केंद्र की तरह देखना भी बंद कर देते हैं।

तब हमें सिर्फ दो केंद्र दिखाई पड़ते हैं: एक मस्तिष्क जहां निरंतर विचार चलते रहते हैं, और थोडा बहुत हृदय जहां भावों का प्रवाह रहता है। इससे गहराई में हमारा किसी चीज से संपर्क नहीं बन पाता। तो जितना हल्का खाना होगा, उतना वह शरीर में कम भारीपन बनाएगा, और अंतर यात्रा शुरू करने के लिए वह ज्यादा मूल्यवान और महत्वपूर्ण बन जायेगा।

सही आहार के बारे में ये याद रखना चाहिए की ये उत्तेजना न पैदा करे, ये नशीला न हो, और भारी न लगे। सही आहार लेने के बाद आपको भारीपन और तंद्रा महसूस नहीं होनी चाहिए। लेकिन शायद हम सभी भोजन के बाद भारीपन और तंद्रा महसूस करते हैं, तब हमें जानना चाहिए कि हम सही भोजन नहीं कर रहे हैं।

कुछ लोग इसलिए बीमार पड़ते हैं कि उन्हें भरपेट भोजन नहीं मिलता और कुछ ज्यादा खाने के कारण रोगग्रस्त रहते हैं। कुछ लोग भूख से मरते हैं तो कुछ जरुरत से ज्यादा खाने से। और जरुरत से ज्यादा खाने के कारण मरने वालों की संख्या हमेशा भूख से मरने वालों से ज्यादा रही है। भूख से बड़े कम लोग मरते हैं। अगर एक आदमी भूखा भी रहना चाहे तो 3 महीने से पहले उसके भूख से मरने की कोई सम्भावना नहीं है। कोई भी व्यक्ति 3 महीने तक भूखा रह सकता है। लेकिन अगर कोई 3 महीने तक जरुरत से ज्यादा खाना खाता रहे तो उसके बचने की कोई संभावना नहीं है।

भोजन के प्रति गलत नजरिये हमारे लिए खतरनाक बनते जा रहे हैं। ये बहुत महंगे साबित हो रहे हैं। ये हमें ऐसी स्थिति में ले जा चुके हैं जहां हम बस किसी तरह जीवित हैं। हमारा भोजन शरीर को स्वास्थ्य देने की बजाय बीमारियां देता जान पड़ता है। यह ऐसा हुआ जैसे सुबह उगता सूरज अन्धकार पैदा करे। यह भी उतनी ही आश्चर्यजनक और अजीब बात होगी। परन्तु दुनिया के सभी चिकित्सकों की यह आम राय है कि मनुष्य की ज्यादातर बीमारियां गलत खानपान के कारण हैं।

तो पहली बात यह कि हर मनुष्य अपने भोजन के प्रति जागरूक और सचेत हो। और यह बात मैं ध्यानी के लिए विशेष रूप से कह रहा हूं। एक ध्यानी के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वह अनपे भोजन के प्रति जागरूक रहे, कि वह क्या खा रहा है, कितना खा रहा है, और इसका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा। अगर कोई व्यक्ति जागरूकता से कुछ महीने प्रयोग करे, तो वह निश्चित रूप से पता लगा लेगा कि कौन सा भोजन उसे स्थिरता, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करता है। इसमें कोई मुश्किल नहीं है, परन्तु यदि हम अपने भोजन के प्रति जागरूक नहीं हैं, तो हम कभी अपने लिए सही भोजन नहीं तलाश पाएंगे|

ओशो, अंतरयात्रा, द इंनर जर्नी # 1, प्रवचन #3


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