नवंबर 11, 2018

अपना

ओशो...
मैंने सुना है कि एक युवक धन की खोज में निकला। वह एक राजमहल के बाहर आकर रुका। सुंदर स्वस्थ युवक था। सम्राट सुबह-सुबह अपने घोड़े पर निकला था। उसने इस युवक से पूछा कि कैसे बैठे हो? कुछ काम की तलाश है? उसने कहा, काम की तलाश में निकला हूं। धन कमाने निकला हूं। कर क्या सकते हो? उसने कहा, मैं शिल्पी हूं। मकान बना सकता हूं, भवन बना सकता हूं, मंदिर बना सकता हूं, मूर्तियां गढ़ सकता हूं। स्थापत्य मेरा विषय है। सम्राट ने कहा, हमें जरूरत है। आ जाओ; महल के भीतर प्रवेश कर जाओ। यह जो दुर्ग है महल के आस-पास, इसके भीतर तुम्हें जो भी भोगना हो भोगो; जो भी खाना हो खाओ; जो भी पीना हो पीओ; जो भी पहनना हो पहनो। किसी चीज की कमी न रहेगी। तुम सम्राट की तरह रहो। लेकिन एक बात ध्यान रखना: जिस दिन भी मैं नाराज हो जाऊंगा, उस दिन जैसे यहां बैठे हो, इन्हीं कपड़ों में, बस इतने ही सामान के साथ दरवाजे से बाहर होना पड़ेगा। जब तक हो, सम्राट की तरह रहो। जाते वक्त ये ही कपड़े, ये ही फटे जूते, यही झोला, और यही सामान। इसको सम्हाल कर रख दो तिजोड़ी में महल की। अभी मजे से सम्राट की तरह रहो। वह युवक महल में काम करने पर लग गया। सम्राट की तरह रहने लगा, मगर भीतर एक बेचैनी तो बनी ही रही। सब कपड़े थे, कीमती थे, लेकिन जानता था ये मेरे नहीं हैं। हीरे-जवाहरात मिल गए थे पहनने को, लेकिन जानता था ये मेरे नहीं हैं। शानदार घोड़ों पर चढ़ता था, हजारों लोग नमस्कार करते थे। लेकिन जानता था कि किसी भी दिन जरा गड़बड़ हुई कि दरवाजे के बाहर कर दिए जाएंगे। वही पुराना झोला और वही पुराना कपड़ा! वही तुम्हारे राष्ट्रपतियों की हालत है, तुम्हारे प्रधानमंत्रियों की। जिस दिन भी बाहर हुए--वही पुराना झोला, वही पुराना कपड़ा। इसलिए घबड़ाहट है। और बाहर होने का डर है, क्योंकि दूसरे भीतर घुसने की कोशिश कर रहे हैं। चारों तरफ से कोशिश चल रही है। दुश्मन तो दुश्मन हैं ही; जो अपने हैं, जो बिलकुल बैठे हैं पास सिंहासन के, वे भी हाथ रखे हैं कि कब मौका पड़े कि टांग पकड़ लें। अपने भी पराए; पराए तो पराए। दुश्मन तो दुश्मन; मित्र भी दुश्मन। इस घबड़ाहट में फिर जीवन बीतता है। इस चिंता में फिर जीवन बीतता है। जब तक माला न मिले, पद न मिले, तब तक दो कौड़ी का भाव सताता है। फिर दो कौड़ी को छिपा लो पद में, तब यह भाव सताने लगता है कि अब यह माला न छिन जाए। और अभी और मालाएं भी पाने को हैं। तो यह माला छिने न; और मालाएं गिरती चली जाएं। और मजा यह है पूरी मूढ़ता का कि अंत में हजारों मालाएं भी तुम्हें छिपा लें, लेकिन तुम जानते ही रहोगे कि वह दो कौड़ी का भाव भीतर पड़ा है। तुम ना-कुछ हो। आखिर एक दिन वह युवक घबड़ा गया। वर्ष बीत गए। उसने आकर सम्राट से कहा, मैं जाता हूं। तो सम्राट ने कहा, कोई बात नहीं हुई। तुम्हें जाने का आदेश नहीं दिया गया। कोई तुम्हें कमी है? तुम बोलो! सम्राट उससे बहुत प्रसन्न था। उसका काम अदभुत था। उसने कहा, काम भी ठीक है, कोई कमी भी नहीं है। लेकिन मैं भलीभांति जानता हूं कि मेरा कुछ भी नहीं है। यहां रुकना ठीक नहीं। अपना कुछ हो, वहीं जाएंगे। मेरा झोला और मेरे कपड़े वापस लौटा दिए जाएं। तुम भला सोचते होओ कि मैं इन महल के वस्त्रों में बड़ा प्रसन्न हूं, लेकिन मैं प्रसन्न नहीं हूं। क्योंकि मैं भीतर तो जानता हूं कि ये मेरे नहीं हैं। जो अपना नहीं है, उससे कहीं तृप्ति हुई है! जो माला किसी दूसरे ने तुम्हें डाली है, वह तुम्हारी नहीं है। और जो पद किसी वोट से मिला है, वह तुम्हारा नहीं है। जो किसी के सहारे से जीता है, वह छीना जाएगा। जो किसी की कृपा से पाया है, वह आज नहीं कल खो जाएगा। न भी खोए तो भी तुम्हारी सत्ता नहीं है वह; तुम्हारी संपदा नहीं है। तुम्हारी आत्मा नहीं है वहां। उस युवक ने ठीक किया। उसने कहा कि मैं जाता हूं। मुझे मेरे कपड़े लौटा दो। मैं जो हूं, अब मैं वही खोजूंगा, जो मेरा हो सके। इसलिए धन जब बहुत मिल जाता है लोगों को, तब उनको भीतर की निर्धनता का बोध होता है। और जब बड़े पदों पर पहुंच जाते हैं, तब उन्हें दीनता का पता चलता है। लेकिन तब तक सारा जीवन खो गया व्यर्थ दौड़ में। और फिर भी बहुत कम हिम्मतवर लोग हैं, जो उन ऊंचाइयों से--झूठी सही--उन ऊंचाइयों से वापस लौटने की कोशिश करते हैं। वह युवक बहुत हिम्मतवर था। उस युवक ने वही किया जो बुद्ध और महावीर ने किया था। महल छोड़े, इसलिए नहीं कि महल अपने थे; महल छोड़े इसलिए कि पहचान लिया कि अपने नहीं हैं और एक दिन झोली लेकर बाहर निकलना पड़ेगा। अच्छा है इसके पहले कि निकाले जाएं, निकल जाना उचित है। बुद्ध और महावीर ने वही किया, जो उस युवक ने किया। उसने कहा, सम्हालो। अब हम उस खोज में जाते हैं, जो अपना हो सके। आत्मा की खोज में जाने का मतलब है, जो अपनी है उसकी खोज में जाते हैं। जो अपनी है वह दूसरे से नहीं मिलती; वह उधार नहीं है। मेरी आत्मा तुम मुझे नहीं दे सकते। कोई मुझे नहीं दे सकता। उसे मुझे ही आविष्कार करना होता है। हां, सम्मान तुम मुझे दे सकते हो। वह उधार है। उन वस्त्रों के भीतर मेरा दो कौड़ी का भाव छिप सकता है। लेकिन जब तक मेरी आत्मा का उदय न हो, वह दो कौड़ी का भाव मिटेगा नहीं। वह अंधकार का हिस्सा है। हीनता की स्थिति, हीन-ग्रंथि अज्ञान है। जब तुम आत्मभाव से भरोगे, तभी हीन-ग्रंथि विसर्जित होती है। उसके पहले विसर्जित नहीं होती। और अच्छा है कि उसके पहले विसर्जित नहीं होती। नहीं तो तुम न मालूम कहां कूड़ा-करकट में दब कर बैठ जाते और समाप्त हो जाते! आज इतना ही। सबै सयाने एक मत-(संंत दादू दयाल)-प्रवचन-04


Call 2 us- 8448447719