नवंबर 05, 2018

असली जहर

मुल्ला नसरुद्दीन मरना चाहता था, तो जहर लाकर पीकर और सो रहा। दों—चार दफा रात में आंख खोलकर देखा, अभी तक मरा कि नहीं! टटोला, ज्यूंटी लेकर देखा कि जिंदा हूं अभी तक असर नहीं हुआ। करवटें बदलता रहा। सुबह हो गयी, आंख खोलकर देखी। पत्नी भी उठकर काम में लग गयी है, बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे हैं—यह किस प्रकार की मौत है! दूधवाला आ गया, द्वार पर दस्तक दे रहा है। पड़ोसी की आवाज सुनाई पड़ रही है… यह किस तरह की मौत है! और जहर इतना पी गया है कि कहते हैं कि उससे अगर चौथाई भी पीया होता तो मर जाता, चार गुना पी गया! उठकर बैठ गया। दर्पण में जाकर देखा कि यह किस तरह की मौत है! और किसी को पता भी नहीं चल रहा है, कोई अर्थी भी नहीं सजायी जा रही और कोई मामला नहीं, पत्नी रो भी नहीं रही, बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे हैं। तब उसे खयाल आया कि यह तो मौत नहीं है। भागा, पहुंचा दुकादार के पास, जहां से जहर खरीदकर लाया था, कि यह क्या मामला है 2: दुकानदार ने कहा कि हम क्या करें? हर चीज में मिलावट है। कोई आजकल शुद्ध जहर मिल सकता है 2: वे जमाने गये, सतयुग की बातें कर रहे हो, शुद्ध जहर! कलियुग चल रहा है, अब कोई शुद्ध जहर वगैरह नहीं मिलता।

संसार में हर चीज में मिलावट है। साधारण आदमी है, उसमें हर चीज मिली—जुली है। जो परमात्मा को पाने चल पड़े हैं, इनका शुद्ध होने लगता है अहंकार। इनका जहर सतयुगी होने लगता है। इसलिए तुम तुम्हारे तथाकथित महात्माओं के भीतर जैसा दंभ और जैसी अस्मिता पाओगे, ऐसी तुम नहीं पाओगे कहीं भी।

इसीलिए तो तुम्हारे पंडित, पुजारी, महात्मा लड़वाते हैं, लड़ते हैं। तुम्हारे मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे अहंकारों के अड्डे बन गये हैं। उनसे प्रेम नहीं पैदा होता, उनसे घृणा पैदा होती है। उनसे जहर फैलता है दुनिया में, अमृत नहीं फैलता।

मरो है जोगी मरो–(गोरख नाथ) प्रवचन–8


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