नवंबर 09, 2018

अंधा कौन?

ओशो...

पांचवां प्रश्‍न:
भगवान, प्रात: प्रवचन—स्थल पर आप पधारते हैं, तो बड़ी देर तक हाथ जोड़े प्रणाम की मुद्रा में आपको देखकर मुझे बड़ी पीड़ा होती है। लगता है कि आप बाहर आकर सीधे बैठ जाया करें। हम अंधों के लिए आपके जुड़े हाथ देखकर मुझे कष्ट होता है।



संबोधि ने पूछा है यह प्रश्‍न:

यह कष्‍ट शुभ है। यह आँख के खुलने की शुरूआत है। इतना भी तुम्‍हें दिखाई पड़ने लगा कि तुम अंधे हो, तो काफी दिखाई पड़ने लगा। जिसको यह दिखायी पड़ने लगा कि मैं अंधा हूं, उसकी आंख खुलने लगी।

कहते हैं: जब पागल को यह समझ में आना शुरू हो जाए कि मै पागल हूं, तो वह ठीक होने लगा। पागल को समझ में आता ही नहीं कि मैं पागल हूं। तुम किसी पागल को पागल कहो, वह तुम्हें पागल सिद्ध करेगा। वह कहेगा मैं और पागल? तुम पागल हो। मुझे जो पागल कहता है, वह पागल है।

पागल अपने को पागल नहीं मानता। पागलपन में इतनी बुद्धिमत्ता हो भी कैसे सकती है कि अपने को पागल मान ले! जिस दिन पागल मानने लगता है कि मैं पागल हूं; बुद्धिमत्ता की पहली किरण उतरी।

जिस दिन तुम जानते हो कि मैं अज्ञानी हूं ज्ञान का पहला प्रकाश उतरा।

शुभ है संबोधि कि इससे पीड़ा होती है। यह पीड़ा अच्छी है। यह पीडा हितकर है कल्याणदायी है।

और तुम पूछती हो कि हम अंधों के लिए आपके हाथ जुडें—यह ठीक नहीं। तुम अंधे हो नहीं, सिर्फ आंख बंद किए बैठे हो। तुम में और बुद्धों में जो अंतर है, वह ऐसा नहीं है कि बुद्ध के पास आंख है और तुम्हारे पास आंख नहीं है। आंख तुम्हारे पास उतनी ही है, जितनी बुद्ध के पास है। लेकिन बुद्ध खोले हैं अपनी आंख; तुम बंद किए हो।

हालांकि मूर्ति में उलटा दिखायी पड़ता है. बुद्ध की आंख बंद है और तुम्हारी खुली है। बुद्ध की आंख बाहर से बंद है, इसलिए भीतर खुली है। तुम्हारी आंख बाहर खुली है, इसलिए भीतर से बंद है। और भीतर खुले, तो ही खुले। भीतर खुलना ही असली खुलना है।

तुम अपने को देखने लगो, तो आंख वाले हुए। तुम देख तो रहे हो, औरों को देख रहे हो। अपने को नहीं देख रहे। जिस दिन अपने को देखने लगोगे, उसी दिन आंख खुल गयी।

तुम अंधे नहीं हो। अंधे का तो मतलब यह होता है. आंख खुल ही नहीं सकती। अंधे का तो मतलब होता है : आंख है ही नहीं; तो खुलेगी कैसे! अंधा मत मान लेना अपने को। कहीं यह मन की तरकीब न बन जाए। मन यह कहने लगे कि तुम तो अंधे हो; यह हो ही नहीं सकता। बात खतम हो गयी। तो जैसे जी रहे हो, जीए जाओ।

नहीं; तुम अंधे नहीं हो। सिर्फ तुम्हारी आंख गलत तरफ खुली है, इसलिए ठीक तरफ बंद है। तुम्हारी दिशा भ्रांत है। ठीक दिशा में चैतन्य बहने लगे, तुम भी आंख वाले हो जाओगे—उतने ही जितने बुद्ध हैं।

एक दिन बुद्ध भी ऐसे ही अंधे थे, जैसे तुम हो। फिर एक दिन आंख वाले बने। तुम भी एक दिन आंख वाले बन सकते हो। तुम जैसे हो, ऐसा ही मैं था। तो मैं जैसा हूं? ऐसे ही तुम भी हो सकते हो। जरा भी भेद नहीं है।

मैं जब तुम्हें हाथ जोड़ रहा हूं, तो तुम्हारी इसी संभावना को हाथ जोड़ रहा हूं। हाथ जोड़कर तुम्हें कह रहा हूं. बुद्ध तुम्हारे भीतर विराजमान हैं। तुम जरा उनकी सुध लो। हाथ जोड़कर तुम्हें इशारा कर रहा हूं कि तुम अपने को उतना ही मत मान लो, जितना तुमने अपने को जाना है। तुम बहुत बडे हो, तुम विराट हो, तुम्हारे भीतर अनंत छिपा है—तत्वमसि। वह, जिसकी तुम खोज कर रहे हो, तुम्हारे भीतर बैठा है। तुम मंदिर हो, प्रभु के मंदिर। तुम्हें पता नहीं है, यह और बात। लेकिन तुम जिस जमीन पर बैठे हो, वहां खजाना गड़ा है।

एक गांव में ऐसा हुआ; एक भिखारी मरा। तीस साल एक ही जगह बैठकर भीख मागता रहा था। जब मर गया, तो पड़ोस के लोगों ने सोचा कि इसके सब चीथड़े जला दो, इसके सब बर्तन फोड़कर फेंक दो। कुछ खास थे भी नहीं। और फिर किसी को खयाल आया कि तीस साल से यह भिखारी इस जमीन को गंदी करता रहा, थोड़ी सी जमीन भी यहां की उखाड़कर नयी जमीन डाल दो। यह अशुद्ध कर गया। बुरी तरह अशुद्ध कर गया! गंदा था।

उन्होंने जमीन थोड़ी सी खोदी। चकित हो गए। उस जमीन में तो हंडे गड़े थे। वहां तो बड़ा खजाना था। और सारा गांव सोच—सोचकर हंसने लगा कि हद्द हो गयी! यह भिखारी भीख मांगता रहा जिंदगी भर और जिस जमीन पर बैठा था, वहां इतना खजाना था कि यह सम्राट हो जाता!

गांव भर हंसा भिखारी पर। लेकिन एक फकीर उस गांव में था, वह पूरे गांव वालों पर हंसा। उसने कहा कि पागलो! तुम उस भिखारी की बात कर रहे हो! यही हालत तुम्हारी है। तुम भी जहां बैठे हो, वहां खजाना गड़ा है। तुम सम्राट हो सकते हो।

लेकिन कोई उसकी बात समझा हो, ऐसा दिखायी नहीं पड़ता। लोग हंसे होंगे कि यह एक और पागल देखो! या हो सकता है कुछ लोग उसकी बात समझे भी होंगे, तो घर जाकर उन्होंने थोड़ी जमीन खोदकर देखी होगी। फिर खजाना नहीं मिला होगा। उन्होंने कहा होगा कि कहां पागल की बातों में पड़े हो! कहीं ऐसा सभी जगह थोड़े ही खजाना गड़ा है। वह तो संयोग की बात थी।

मगर फकीर तुम्हारे भीतर की तरफ इशारा कर रहा था। सब फकीरों के इशारे तुम्हारे भीतर की तरफ हैं। उनके सबके तीर तुम्हारे भीतर की तरफ हैं। किसी से पूछो; एक ही रास्ता बताते हैं. भीतर जाओ। अपने में आओ।

बाहर भटकती आंख को जरा भीतर मोड़ो। यही आंख जो अभी संसार देख रही है; यही आंख जो अभी पदार्थ को देखती है, यही आंख परमात्मा को देख लेगी। आंख तो यही है, सिर्फ इस आंख को परमात्मा की तरफ लगाना है। उस लगाने का नाम ध्यान है।

तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं? ताकि तुम्हें याद आ जाए, ताकि तुम्हें भूल — भूल न जाए, तुम्हें याद बनी ही रहे; रोज—रोज याद आ जाए—कि तुम्हारे भीतर कोई परम आराध्य बैठा है। यही याद सघन होगी, तो तुम बदलोगे, रूपांतरित होओगे। तुम्हारे भीतर क्रांति इसी याद की सघनता से हो सकती है।

एस धम्‍मो सनंतनो–(प्रवचन–106)


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