दिसंबर 12, 2018

अंत तक देखने की तैयारी और साहस


एक बार एक बहुत अदभुत घटना घटी थी। इंद्र ने तीन ऋषियों को स्वर्ग में आमंत्रित किया था। उन तीन ऋषियों की तपश्चर्या की खबर सारी पृथ्वी पर फैल गई थी। इंद्र ने स्वर्ग की सबसे सुंदरी अप्सरा उर्वशी को कहा, इन तीन ऋषियों के मन को किसी भी भांति विचलित करना है। उर्वशी ने कहा, कठिन नहीं है यह काम। ऋषि-मुनि बहुत जल्दी विचलित हो जाते हैं। यह हो सकेगा। क्योंकि जो लोग स्त्रियों से दूर-दूर भागते हैं, उनके मन में स्त्रियों का गहरा आकर्षण है। जल्दी हो सकेगी यह बात। अगर वेश्यालय में पड़े किसी आदमी को विचलित करना होता तो बहुत कठिन था। क्योंकि वह स्त्रियों से इतना परिचित है कि उसे विचलित करना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन ऋषि-मुनि हैं, ये तो बेचारे जल्दी ही मुश्किल में पड़ सकते हैं।
निमंत्रण दे दिया गया। स्वर्ग का निमंत्रण था। ऋषि-मुनि भी इनकार न कर सके। क्योंकि ऋषि-मुनि सारी कोशिश ही स्वर्ग पहुंचने की करते हैं और कोशिश ही क्या है? निमंत्रण पाकर बहुत प्रसन्न हुए। बड़ा सम्मान था यह। इंद्र का जन्मदिन था और उन तीन को ही बुलाया गया था। और उनके जितने कांपटीटर ऋषि-मुनि थे, वे नहीं बुलाए गए थे, इससे बड़ी प्रसन्नता थी। वे काफी खुश हुए। वे गए। सब तरह से सज-धजकर गए। ऋषि-मुनियों की भी अपनी सज-धज होती है। आप पहचान नहीं पाते, यह दूसरी बात है, क्योंकि आपकी सज-धज दूसरे तरह की होती है। तरह का फर्क होता है, सज-धज में कोई भेद नहीं होता। वे परिपूर्ण तैयारी से, पूरे ऋषि-मुनि बनकर वहां उपस्थित हो गए। उर्वशी भी उस दिन तैयार हुई थी। और जितनी उन दिनों प्रसाधन की, जितनी भी सुंदर होने की--जितने भी एक्सपर्ट होंगे स्वर्ग में, जितने विशेषज्ञ थे, सबने मेहनत की थी। उर्वशी इतनी सुंदर दिखाई पड़ी कि खुद इंद्र मुश्किल में पड़ गया। उसे कल्पना न थी कि उर्वशी इतनी सुंदर हो सकती है! उर्वशी का नृत्य शुरू हुआ। घंटेभर में ही, मंत्रमुग्ध वे सारे लोग देखते रह गए। कभी परिचित न थे इतने सुंदर नृत्य से, इतने मनो-मुग्धकारी। फिर उर्वशी ने, जब रात गहरी हो गई, तो अपने आभूषण निकालकर फेंक दिए। आभूषण शरीर को सुंदर करते हैं। लेकिन आभूषण-रहित शरीर का भी अपना एक और ही सौंदर्य है। आभूषण सुंदर भी करते हैं, लेकिन शरीर को बहुत जगह छिपा भी लेते हैं। आभूषण फेंककर उसने वस्त्र भी फेंकने शुरू कर दिए। एक ऋषि घबड़ाया और जोर से चिल्लाया रुको, ठहरो! उर्वशी यह मर्यादा का उल्लंघन है। वस्त्र नहीं निकाल सकती हो। लेकिन दूसरे दो ऋषियों ने कहा, मित्र, अगर आप घबड़ा गए हों तो आंखें बंद कर लें, नृत्य बंद नहीं होगा। नृत्य को आप कैसे रोक सकते हैं? और किसी को वस्त्र निकालना हो तो भी आप कैसे रोक सकते हैं? आपका हक और अधिकार क्या है? एक हक आपका जरूर है कि आप आंख बंद कर लें। नृत्य चलेगा। और उन्होंने कहा, उर्वशी नृत्य चलने दो। नृत्य चला। पहले ऋषि ने आंखें बंद कर लीं। लेकिन उस बेचारे को पता नहीं था कि खुली आंख--फिर भी गनीमत थी, बंद आंख--और भी मुश्किल में डाल दी। आंख बंद करने से कहीं उर्वशियां दिखना बंद होती हैं? आंख बंद करने से कुछ भी चीज दिखनी बंद होती है क्या? आंख बंद होने से उर्वशी और सुंदर दिखाई पड़ने लगी। सपने सुंदर होते हैं जागरण से ज्यादा। और सुंदर होकर मन को दिखाई पड़ने लगी। और मन भीतर से धक्के देने लगा ऋषि को कि आंख खोलो। आंख खुली थी तो कम से कम यह उपद्रव नहीं था। मन कहने लगा, आंख खोलो। वह पीछे के अनकांशस हिस्से कहने लगे, आंख खोलो। पता नहीं उर्वशी ने और भी वस्त्र फेंक दिए हों, आंख खोलो। और यह चेतन मन कहने लगा, आंख कैसे खोली जा सकती है? हाथ-पैर कंपने लगे। आंख को और जोर से बंद करना जरूरी हो गया। बड़ी ताकत, बड़ी मेहनत उस ऋषि पर पड़ने लगी। वह बड़ी बेचैनी में पड़ गया। बड़ी मुश्किल में पड़ गया। नृत्य थोड़ा आगे गया। उर्वशी ने और भी वस्त्र फेंक दिए, वह करीब-करीब नग्न हो गई। एक ही वस्त्र उसके शरीर पर रह गया। दूसरा ऋषि चिल्लाया, अब हद हो गई, यह तो अश्लीलता है। बंद करो, यह नृत्य अब नहीं देखा जा सकता। पहले ऋषि ने कहा, मित्र, भूल गए, हमने पहले ऋषि से क्या कहा था? तीसरे ऋषि ने कहा, अब अपनी आंख आप भी बंद कर लो। नृत्य तो चलेगा। नृत्य को रोकने का हक किसे है? आप अपनी आंख बंद कर ले सकते हैं। दूसरे ऋषि को भी आंख बंद कर लेनी पड़ी। नृत्य आगे चलता रहा। आंख बंद करते ही दूसरे ऋषि को पता चला कि कम से कम आंख खुली थी तो उर्वशी एक वस्त्र पहने थी। आंख बंद करते ही ऋषि के मन ने उस वस्त्र को भी निकालकर अलग कर दिया। बहुत घबड़ाया। उर्वशी--आंख बंद थी, लेकिन नग्न खड़ी थी। जिससे बचने को आंख बंद की थी, वही सामने आ गया था। हमेशा यही होता है। जिससे बचने को हम आंख बंद करते हैं, वही सामने आ जाता है। आएगा ही। क्योंकि आंख बंद करने में हमने इतना रस जाहिर किया है कि रस निमंत्रण हो गया। आना जरूरी है उसका। दूसरा ऋषि भी कंप रहा है, घबड़ा रहा है। उर्वशी ने अंतिम वस्त्र भी फेंक दिया। सोचा था अंतिम वस्त्र फेंकते ही तीसरा ऋषि भी घबड़ा जाएगा। लेकिन उर्वशी भूल में थी। वस्त्र फेंक दिया गया। तीसरा ऋषि देखता रहा, देखता रहा। उर्वशी अब घबड़ाई। अब उसके पास फेंकने को कुछ भी न बचा था। अब और नग्न होना असंभव था। अब कुछ था ही नहीं। अब वह नग्न, और सीधी, और साफ खड़ी थी। अब और उघाड़ने को कुछ बाकी न बचा था। और यह ऋषि देखे ही चला जा रहा था। उस ऋषि ने उर्वशी को थका और घबड़ाया हुआ देखकर कहा, और कुछ फेंकना हो तो फेंक दो। अगर यह चमड़ी फेंकनी हो तो चमड़ी फेंक दो। इस केंचुल को भी उतार डालो। आज मैं देखने को ही खड़ा हूं कि आखिर में है क्या? मैं पूरा ही देखने को आज आ गया हूं। उर्वशी उसके पैरों पर गिर पड़ी। उसने कहा, फिर मैं आपसे हार गई। क्योंकि जो पूरा ही देखने को राजी है, वह आखिरी में पा ही लेगा कि कुछ भी नहीं है। जो पूरा ही देखने को राजी है, वह जान ही लेगा कि कुछ भी नहीं है। जो पूरा देखने के पहले रुक जाता है, उसका रस भी भीतर रुक जाता है कि शायद कुछ शेष रह गया, उसे और जान लेता। और वह जो शेष रह गया है, वही उसके प्राणों की जकड़ हो जाती है। अब आपको हराने का मेरे पास कोई उपाय नहीं। मैं हार गई। उर्वशी पैर पर गिर पड़ी। वह ऋषि नहीं हराया जा सका। क्यों? क्योंकि वह अंत तक देखने को तैयारी और साहस किया। वही यात्रा कर सकता है सत्य की, जो इस बात को हिम्मत से जानने को तैयार है कि कुछ भी हो, जो सच्चाई है उसे मैं जानना चाहता हूं। चाहे मेरे सारे फूल गिर जाएं, मेरी सारी सजावट गिर जाए, मेरा सारा सौंदर्य उखड़ जाए; लेकिन जो मन है, चाहे वह कितना ही अग्ली हो, मैं उसको देखने के लिए तैयार हूं। चित्त की वृत्तियां भी उर्वशियों की भांति हैं। जो उनको पूरा, उनकी पूरी नग्नता में, उनकी पूरी नेकेडनेस में देखने को तैयार हो जाता है, उनके सब वस्त्र उतारकर--वे चित्त की वृत्तियां भी पैरों पर गिर जाती हैं और क्षमा मांग लेती हैं कि अब हम हार गए। लेकिन जो चित्त की वृत्तियों को छिपा लेता है, वस्त्रों में ढांक देता है, आंख बंद कर लेता है, वह हार जाता है वृत्तियों से। वृत्तियों से वही जीतता है, जो वृत्तियों को पूरा देखने के लिए तैयार और तत्पर है। यह तैयारी निरीक्षण की, जागरण की--वृत्तियों को उनकी समग्रता में, उनकी पूर्णता में ही--जीवन को बदलने, नया करने, सत्य की ओर आंखें खोलने, जीवन की जो जड़ें हैं, उनको पहचानने का मार्ग है। इसका साहस चाहिए। और साहस का एक ही अर्थ है: अपनी हमने जो प्रतिमा बना रखी है, स्वयं को हम जो समझे हुए बैठे हैं, और समझा रहे हैं कि हम हैं--उसे गिर जाने का, उसकी ईंटें खिसक जाने का, उसके भवन के मिट जाने का हम में बल चाहिए कि हम उसे गिरता हुआ देख सकें। और पुराना ढांचा गिरे तो ही फिर नया ढांचा बन सकता है।
 ओशो
 एक संत ऐसा भी

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