दिसंबर 18, 2018

नियम का तोड़



जैन मुनियों में, विशेषकर दिगंबर जैन मुनियों में, महावीर के समय से चला मृगया एक नियम है, प्यारा नियम है।

महावीर जब निकलते थे सुबह ध्यान के बाद भिक्षा के लिए, तो वे एक व्रत ले लेते थे मन में कि अगर आज किसी घर के सामने दो आम लटके होंगे, तो मैं भोजन ले लूंगा।

या किसी घर के सामने एक काली गाय ,हड़ी होगी तो भोजन ले लूंगा। ऐसा एक नियम ले लेते, फिर सारे गांव में घूम आते।

कभी—कभी महीनों तक भी भोजन नहीं मिलता था, क्योंकि अब इसका क्या भरोसा।

एक दफा उन्होंने नियम ले लिया कि एक बैल खड़ा हो, और बैल के सींग में गुड़ लगा हो। तीन महीने तक बैल न मिला।

अब बैल के सींग में गुड़ लगा हुआ! फिर जिस घर के सामने खड़ा हो उस घर के लोग नियंत्रण दें, तब न। तो कई बातें मिलनी चाहिए। वह मेल नहीं खाईं तो तीन महीने तक वे वापस लौट आते थे।

दिगंबर जैन मुनि अभी भी इसका पालन करता है। लेकिन उसने कानूनी तरकीब निकाल ली है। वह दो—तीन चीजें उसने तय कर रखी हैं, बस उतने ही लेता है नियम।

तो तुम बहुत चकित होगे, जब दिगंबर जैन मुनि गांव में आता है तो कई घरों के सामने तुम देखोगे कि दो केले लटके हैं, दो आम लटके हैं। बस वह दो—तीन चीजें है, तो सभी घरों के सामने उतनी चीजें लटका देते हैं।

अब यह कानूनी तरकीब तो गयी। अब वह एक भी दिन बिना भोजन किए नहीं जाता।

महावीर को तीन महीने तक भी एक दफा भोजन बिना किए जाना पड़ा था। और अक्सर बिना भोजन किए जाना पड़ता था।

महावीर के बारह साल की साधना के समय में, कहते हैं, कुल तीन सौ पैंसठ दिन उन्हें भोजन मिला था। मतलब ग्यारह साल भूखे और एक साल भोजन, ऐसा। एक—एक दिन कभी सात दिन के बाद, कभी पंद्रह दिन के बाद, कभी महीनेभर के बाद। जरूर उन्होंने कोई कानूनी तरकीब नहीं की होगी, नहीं तो अपना एक ही नियम रोज ले लिया कि दो केले।

धीरे—धीरे लोगों को पता चल ही जाएगा कि जहां दो केले लटके होते हैं, वहीं ये भोजन लेते हैं, तो फिर श्रावक दो केले लटकाने लगेंगे। दो क्या वे दो सौ लटका दें, तो उससे कोई फर्क! कितनी अड़चन है उसमें!

इतना ही नहीं, दिगंबर जैन मुनि किसी गांव में जाए, हो सकता है लोगों को पता न हो, नए गांव में पहुंचे, लोगों को पता न हो कि वह क्या नियम लेता है, तो एक चौका उसके साथ चलता है।

एक श्रावक, एक श्राविका, दो—चार सज्जन—एक चौका उसके साथ चलता है। तो वह हर गांव में जहां जाता है, उसके एक दिन पहले पहुंच जाते हैं। गांव के लोग तो भोजन बनाते ही हैं, अगर वहां नही मिले तो इस चौके वालों को तो पक्का पता है, अगर गांव में न मिल पाएं तो लौटकर इस चौके में भोजन मिल जाता है, लेकिन भोजन कभी चूकता नहीं।

फिर जरूरत क्या है इसको करने की? वह महावीर की जो बात थी वह तो खो गयी। आदमी बेईमान है।

जहां कानूनी तरकीबें हैं, वहां आदमी की सरलता खो जाती है, पाखंड शुरू हो जाता है।

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-077


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