दिसंबर 19, 2018

नारी एक और आयाम

|| नारी एक और आयाम  ||
_______ __________________$ एक स्‍त्री चालीस-पचास वर्ष तक एक मशीन की तरह सुबह से सांझ, यंत्र की तरह वही काम करती रहती है और इसका परिणाम है कि मनुष्य के पूरे जीवन में विष घुल जाता है।

एक स्‍त्री जब चौबीस घंटे ऊब वाला काम करती है। रोज बर्तन मलती है, वहीं रोटी, वही खाना; वही उठना, वही कपड़े धोना, वही बिस्तर लगाना; रोज एक चक्कर में सारा काम चलता है। थोड़े दिन में वह इस सबसे ऊब जाती है। लेकिन फिर भी करना पडता है।

और जिस काम से कोई ऊब गया हो और फिर भी करना पड़े तो उसका बदला वह किसी न किसी से लेगी ही। इसलिए स्रियां हर पुरुष से हर तरह का बदला ले रही हैं,  पुरुष घर आया कि स्‍त्री तैयार है टूटने के लिए। इसलिए पुरुष घर के बाहर घूमते फिरते हैं। क्लब बनाते हैं, सिनेमा जाते हैं, पच्चीस उपाय सोचते है।

वह अपने को समझा रहे हैं कि सावधान, स्‍त्री नर्क का द्वार है, इससे बचना! स्‍त्री की तरफ देखना भी मत। यह इन घबड़ाये हुए, भागे हुए/ एस्केपिस्ट, पलायनवादी लोगों ने स्‍त्री को समझने, आदृत होने, सम्मानित होने, साथ खड़े होने का मौका ही नहीं दिया।

अभी जब मैं बम्बई था कुछ दिन पहले, एक मित्र ने आकर मुझे खबर दी कि एक बहुत बड़े संन्यासी वहां प्रवचन कर रहे है। भगवान की कथा कर रहे है और स्‍त्री नहीं छू सकती हैं उन्हें! एक स्री अजनबी आयी होगी! उसने उनके पैर छू लिए तो महाराज भारी कष्ट में पड़ गये हैं! अपवित्र हो गये है! उन्होने सात दिन का उपवास किया है शुद्धता के लिए! जहा दस पन्द्रह हजार स्रियां पहुंचती थीं, वहाँ सात दिन के उपवास के कारण एक लाख स्रियां इकट्ठी होने लगीं कि यह आदमी असली साधु है!

स्रियां भी यही सोचती है कि जो उनके छूने से अपवित्र हो जायेगा, वहीं असली साधु है! हमने उनको समझाया हुआ है। नहीं तो वहां एक स्‍त्री भी नहीं जानी चाहिए थी, क्योंकि यह किसी भी स्‍त्री के लिए भारी अपमान की बात है।

लेकिन अपमान का खयाल ही मिट गया है। लम्बी गुलामी अपमान के खयाल को मिटा देती है। लाख स्रियां वहां इकट्ठी हो गयी, सारी बम्बई में यही चर्चा है कि यह आदमी है असली साधु! स्‍त्री के छूने से अपवित्र हो गया है, सात दिन का उपवास कर रहा है! उन महाराज से किसी को पूछना चाहिए, पैदा किस से हुए थे? हड्डी, मांस, मज्जा किसने बनाया था? वह सब स्‍त्री से लेकर आ गये और अब स्त्री के छूने से अपवित्र होते है। हद्द कमजोर साधुता है, जो स्‍त्री के छूने से अपवित्र हो जाती है! लेकिन इन्ही सारे लोगों की लम्बी परपरा ने स्‍त्री को दीन-हीन और नीचा बनाया है। और मजा यह है कि यह जो दीन-हीनता की लम्बी परंपरा है, इस परंपरा को तो स्त्रियां ही पूरी तरह बल देने में अग्रणी है! कभी के मंदिर मिट जायें और गिरजे समाप्त हो जायें, लेकिन स्रियां ही इन मंदिर-गिरजों का, साधु-संतों का पालन पोषण कर रही है। चार स्रियां दिखायी पड़ेगी एक साधु के पास, तब कही एक पुरुष दिखायी पड़ेगा। वह पुरुष भी अपनी पत्नी के पीछे बेचारा चला आया हुआ होगा।

तीसरी बात मैं आपसे यह कहना चाहता हू कि जब तक हम स्‍त्री-पुरुष के बीच के ये अपमानजनक फासले और अपमानजनक दूरियां नहीं तोड़ देते हैं, तब तक शायद हम स्‍त्री को समान हक भी नहीं दे सकते।

को-एजुकेशन शुरू हुई है। अब सैकड़ों विश्वविद्यालय, महाविद्यालय को-एजुकेशन दे रहे हैं। लड़कियां-लड़के साथ पढ़ रहे हैं। लेकिन बड़ी अजीब सी हालत दिखायी पड़ती है। लड़के एक तरफ बैठे हुए है, लड़कियां दूसरी तरफ बैठी हुई हैं! बीच में पुलिस की तरह प्रोफेसर खड़ा हुआ है! यह कोई मतलब है? यह कितना अशोभन, अनकल्चर्ड है। को-एजुकेशन का अब एक ही मतलब हो सकता है कि कालेज या विश्वविद्यालय स्‍त्री पुरुष में कोई फर्क नहीं करता। को-एजुकेशन का एक ही मतलब हो सकता है कि अब कालेज की दृष्टि में सेक्स डिफरेंसेस का कोई सवाल नहीं है।

आखिरी बात, और अपनी चर्चा मैं पूरी कर दूंगा।

वह यह कि अगर एक बेहतर दुनिया बनानी हो तो स्‍त्री पुरुष के समस्त फासले गिरा देने हैं। भिन्नता बचेगी, लेकिन समान तल पर दोनों को खड़ा कर देना है और ऐसा इंतजाम करना है कि 'स्‍त्री को स्‍त्री होने की कांशसनेस' और 'पुरुष को पुरुष होने की कांशसनेस' चौबीस घंटे न घेरे रहे। यह पता भी नहीं चलना चाहिए। अभी तो हम इतने लोग यहां बैठे हैं, एक स्‍त्री आये तो सारे लोगों को खयाल हो जाता है कि स्‍त्री आ गयी। स्‍त्री को भी पूरा खयाल है कि पुरुष यहाँ बैठे हुए है। यह अशिष्टता है, अनकल्चर्डनेस है, असंस्कृति है, असभ्यता है। यह बोध नहीं होना चाहिए। ये बोध गिरने चाहिए। अगर ये गिर सकें, तो ही हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकते है

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