दिसंबर 19, 2018

सस्ता धंधा


टाल्सटाय की प्रसिद्ध कहानी याद आई कि एक आदमी के घर एक फकीर मेहमान हुआ। वह आदमी गरीब किसान था, छोटी-सी जमीन थी, किसी तरह गुजारा हो जाता था। उस फकीर ने कहा कि तू भी पागल है, इस छोटी-सी जमीन में कैसे गुजारा! किसी तरह जी रहा है--अधखाया, अधपीया--न ठीक वस्त्र हैं, न ठीक मकान है। मैं घूमता रहता हूं--परिव्राजक हूं--साइबेरिया में मैं ऐसे स्थान जानता हूं जहां मीलों जमीन पड़ी है। और बड़ी उपजाऊ जमीन। तू इस जमीन को बेच दे, इस मकान को बेच दे, इतने से पैसे को लेकर तू चला जा। मैं एक जगह तो ऐसी भी जानता हूं जहां लोग इतने पैसे में तुझे इतनी जमीन दे देंगे कि तू कल्पना भी नहीं कर सकता।
मोह जगा, लोभ जगा कि क्यों यहां पड़ा रहूं! सुबह फकीर तो चला गया, लेकिन उसने अपनी जमीन बेच दी, मकान बेच दिया। पत्नी-बच्चों को कहा कि तुम थोड़े समय यहां रुको, मैं जाकर वहां जमीन खरीद लूं, मकान का इंतजाम कर लूं, फिर तुम्हें ले चलूंगा। वह आदमी गया। जब पहुंचा तो सच में चकित हुआ। फकीर ने जो कहा था, ठीक था। मीलों उपजाऊ जमीन पड़ी थी। दूर-दूर तक कोई आदमी का पता न था। बामुश्किल तो आदमियों को खोज पाया कि किनसे खरीदनी है! किसकी है? गांव के लोगों ने कहा, भई, किसी की नहीं है। मगर हमारा यह नियम है कि अगर इतना पैसा--अगर एक हजार रुपया तुम देते हो--तो तुम दिन भर में जितनी जमीन घेर सकते हो घेर लो, वह तुम्हारी। और हमारे पास कोई मापदंड नहीं है। तुम चलना शुरू करो और खूंटियां गड़ाते जाओ; दिन भर में तुम जितनी जमीन घेर सकते हो, घेर लो; बस यही हमारा हिसाब है, इसी तरह हम जमीन बेचते हैं। उसकी तो आंखें फटी की फटी रह गईं। भरोसा ही नहीं आया। जरा-सा जमीन का टुकड़ा था उसके पास जिसको वह बेच कर आया था--और दिन भर में तो वह न मालूम कितनी घेर लेगा! मजबूत काठी का आदमी था, किसान था। उसने कहा, अरे, दिन भर में तो मैं मीलों का चक्कर मार लूंगा! गजब हो गया! फकीर ने ठीक कहा था। दूसरे दिन सुबह ही उसने जितना पैसा लाया था दे दिया और उसने कहा कि मैं अब जमीन घेरने निकलता हूं। उन्होंने कहा कि निकलो! सुबह सूरज उदय होते हुए निकला। कहा कि सूरज डूबने के पहले लौट आना। अगर सूरज डूब गया तो पैसे डूब गए। सूरज डूबने के पहले लौट आना, तो जितनी जमीन तुमने घेर ली, वह तुम्हारी, यह शर्त है। उसने कहा कि बिलकुल लौट आऊंगा। वह भागा! चलना क्या, ऐसा कोई मौका चलने का होता है! भागा, दौड़ा! अपने जीवन में ऐसा कभी नहीं दौड़ा था। जितनी जमीन घेर ले, उसकी होने वाली थी। दिन में कई दफा--साथ ले गया था रोटी भी, पानी भी--भूख भी लगी, दौड़ भी रहा था, ऐसा कभी दौड़ा भी नहीं था, मगर उसने कहा एक दिन अगर भोजन न किया तो कोई हर्ज है! कोई मर थोड़े ही जाऊंगा! मगर भोजन करने बैठूं, आधा घंटा खराब हो जाए, इतनी देर में तो और आधा मील जमीन घेर लूंगा। पानी भी न पीया। उसने कहा, एक दिन में कोई मर थोड़े ही जाता है! और प्यास बहुत लग रही थी, क्योंकि धूप तेज होने लगी थी। पसीना-पसीना हो रहा था, ऐसा कभी दौड़ा भी न था, मगर--पानी पास में था, थर्मस साथ ले गया था--लेकिन यह कोई समय है, पानी पीने में गंवाने का! और पानी पी लो, पेट भारी हो जाए, दौड़ न सको! बेहतर यही है कि आज तो दौड़ ही लो। अभी थोड़े ही तो घंटों की बात है, सूरज डूबते-डूबते पहुंच जाना है, फिर जी भर कर भोजन करूंगा, विश्राम करूंगा! अरे, दो दिन सोया ही रहूंगा! फिर तो जिंदगी में चैन ही चैन है। आज एक दिन की मेहनत और फिर जिंदगी भर मजा ही मजा। तुम भी यही सोचते। कोई भी गणित को समझने वाला आदमी यही सोचता, जो उसने सोचा। उस पर हंसना मत, वह तुम्हारे ही भीतर छिपा हुआ मन है। वह आदमी कहीं बाहर नहीं है, वह तुम ही हो। वह आदमी दौड़ता ही रहा, दौड़ता ही रहा। उसने सोचा था कि जब सूरज ठीक मध्य में आ जाएगा, आधा दिन हो जाएगा, तब लौट पडूंगा। क्योंकि फिर लौटती यात्रा भी पूरी करनी है। सूरज मध्य में आ गया, लेकिन मन न माने, क्योंकि आगे की जमीन और उपजाऊ, आगे की जमीन और उपजाऊ! जैसे-जैसे आगे बढ़े, और उपजाऊ जमीन। सुबह जो घेरी थी, उससे बेहतर जमीन। और उससे बेहतर जमीन आगे पड़ी है। सोचने लगा कि थोड़ा तेजी से दौडूं तो जल्दी नहीं है लौटने की, थोड़ी देर में भी लौटा तो चलेगा, मगर यह जमीन छोड़ने जैसी नहीं है। और सामने विस्तार ही था, जिसका कोई अंत ही न होता था। अब तो करीब-करीब एक चौथाई दिन ही बचा था। तब उसने कहा, अब खतरा है, अब लौटना चाहिए। अब सारी ताकत लगा दी। उसने रोटी फेंक दी, थर्मस फेंक दी, वस्त्र-कोट निकाल कर फेंक दिया। क्योंकि अब वजन रखना ठीक नहीं, अब तो ऐसे भागना है कि जैसे मौत पीछे लगी हो--क्योंकि सूरज डूबा जा रहा है। भागा! भागा! सूरज के डूबते-डूबते करीब-करीब पहुंच गया। गांव भर इकट्ठा था, लोग जोर से हाथ हिला रहे थे, इशारा कर रहे थे कि तेजी से, तेजी से, और तेजी से, क्योंकि सूरज डूब रहा है। उसे लोग दिखाई पड़ रहे थे, उनकी आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। वे उसे बढ़ावा दे रहे थे कि भागो, भागो, चूको मत, इशारा कर रहे थे सूरज की तरफ--उसे सब दिखाई पड़ रहा था, पहाड़ी पर खड़े हुए लोग, मगर उसके पैर जवाब दे रहे थे। कंठ सूख गया था, आवाज भी नहीं निकल सकती थी। गिरा, अब गिरा तब गिरा, ऐसी हालत हो रही थी। और यह कोई समय है गिरने का! और आखिर-आखिर-आखिर पहुंचते-पहुंचते गिर ही पड़ा। वह जो खूंटी सुबह गाड़ गया था, उससे केवल छह फीट दूर। सरकने की कोशिश की, लेकिन उतनी भी ताकत बची न थी। गांव की भीड़ इकट्ठी हो गई थी और लोग खिलखिला कर हंस रहे थे। मरते वक्त उसने इतना ही पूछा कि तुम खिलखिला क्यों रहे हो? हंस क्यों रहे हो? उन लोगों ने कहा, हम इसलिए हंस रहे हैं कि तुम पहले आदमी नहीं हो, इसी तरह यहां बहुत लोग आकर मर चुके हैं। आज तक कोई भी खूंटी तक नहीं पहुंच पाया। यह हम जो धंधा कर रहे हैं, सस्ता नहीं है। अब तुम मर ही रहे हो, तुम्हें बता देते हैं। हम सुबह से ही जानते हैं कि तुम्हारे हजार रुपए गए। तुम सोचते हो कि तुम न मालूम कितनी जमीन पा लोगे, लेकिन आज तक कोई पा नहीं सका। इसी खूंटी के पास कितने लोगों को हमने मरते देखा है! हमारे बुजुर्गों ने मरते देखा है! उनके बुजुर्गों ने मरते देखा है! सदियों से यह धंधा चलता रहा है। हम यह धंधा ही करते हैं। तुम कोई नए आदमी नहीं हो। एक आदमी और आ गया है आज, कल सुबह वह दौड़ेगा। मगर फिर भी तुम काफी करीब आ गए, केवल छह फीट दूर, शांति से मरो! मगर क्या वह आदमी खाक शांति से मरे! जीवन भर की मेहनत का पैसा गया और दिन भर उसने जो मेहनत की थी जीवन भर में न की थी, वह भी व्यर्थ गई और यह खूंटी छह फीट दूर! आंखों के सामने दिखाई पड़ रही है, हाथ फैलाता है, लेकिन छू नहीं पाता। हाथ टटोलता है, आंखें धुंधली हुई जा रही हैं, सूरज डूबता जा रहा है और वह आदमी भी मर रहा है। सूरज के डूबते-डूबते वह आदमी मर गया। टाल्सटाय की यह प्रसिद्ध कहानी है, बहुत प्रसिद्ध कहानियों में एक है: "हाउ मच लैंड डज ए मैन रिक्वायर?' आदमी को कितनी जमीन की जरूरत है? केवल छह फीट! क्योंकि वे जो छह फीट बच रहे थे, उसी में उन्होंने उसकी कब्र खोद दी और उसी में गड़ा कर उसको दफना दिया। आदमी को कितनी जमीन की जरूरत है? केवल छह फीट। वह सब दौड़-धाप व्यर्थ गई।

ओशो, लगन मुहरत झूठ सब(प्रवचन-6)


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