जनवरी 06, 2019

प्रेमिका


आखिरी प्रश्न : भगवान्
मैं नौ साल से प्रेमिका ढूंढ रहा हूं कि कोई ऐसी प्रेमिका मिले , जो संसार और ध्यान एक बना दे । नहीं मिली । आशीर्वाद दें कि मैं सही प्रेमिका मिलने तक रुकूं और जबरदस्ती न करूं ।

ओशो : --  प्रेम चैतन्य , ... बडे़ कठिन कार्य में लगे हो ।
परमात्मा जल्दी मिल जाएगा , प्रेमिका मिलनी बहुत कठिन है । और जब तक नहीं मिली है तभी तक सौभाग्य समझो जब मिल जाएगी तो फिर कहोगे कि भगवान , ..... आशीर्वाद दो कि अब कैसे छूटूं !

एक पागलखाने में एक मनोवैज्ञानिक पागलों को देखने गया
था । पागलखाने के प्रधान ने एक कटघरे के सामने खडे़  होकर उसे बताया कि इस पागल को देख रहे हैं ! वह पागल अंदर एक तस्वीर लिए हुए था , छाती से लगा रहा था । आंसू झर-झर गिर रहे थे । वर्षा की झडी़ लगी थी रो रहा था , पुकार रहा था , कि हे प्रिय तुम कहां हो ? कब मिलोगी ? बहुत देर हो गई ? कब तक पुकारूं , कब तक खोजूं ?

पागलखाने के प्रधान ने बताया कि यह आदमी न खाता न
पीता , सूख कर हड्डी हो गया है ; बस यह फोटो लिए हुए  है । मनोवैज्ञानिक ने पूछा : ' यह फोटो किसकी है ? ' उसने कहा : ' यह इसकी प्रेमिका की फोटो है और वह इसे मिली नहीं । उसी दु:ख में यह पागल हो गया । '

फिर दूसरे कटघरे के सामने रुके । वहां एक आदमी अपने
बाल नोंच रहा था और दीवार से सिर मार रहा था । उसने पूछा : 'इसे क्या हो गया ? ' प्रधान ने कहा कि यह वही जो प्रेमिका उसको नहीं मिली , इसको मिल गई । वही स्त्री ! इसका विवाह हो गया उससे । तब से यह  पागल हो गया है । इसकी हालत और बदतर है ।

तुम कह रहे हो : ' मैं नौ साल से प्रेमिका ढूंढ रहा हूं ।
कोई ऐसी प्रेमिका मिले जो संसार और ध्यान एक बना दे !'

ऐसा कभी हुआ है पहले ? या ऐसा कभी होगा ?
असंभव को संभव करने चले हो ? ऐसा होता ही नहीं ।

एक व्यक्ति खोज रहा था कि परिपूर्ण कोई स्त्री मिले ,
पूर्ण स्त्री कोई मिले । जीवन भर खोजा । जब मर रहा था तो किसी ने पूछा कि मिली वह स्त्री कि नहीं जिसकी तुमने जिंदगी भर खोज की ? उसने कहा :  ' मिली क्यों नहीं , दो-तीन बार ऐसे मौके आए । ' तो उस व्यक्ति ने पूछा : ' फिर तुम अविवाहित के अविवाहित  क्यों रहे ? ' उसने कहा कि मैं क्या करूं ,  वह पूर्ण पुरुष खोज रही थी !

तुम तो खोज रहे हो ऐसी प्रेमिका , लेकिन वह भी प्रेमी
खोज रही होगी पूर्ण । वह तुमसे राजी होगी ? असंभव ! तुम पूर्ण ही होओ तो प्रेमिका क्यों खोजो ! और वही पूर्ण हो तो तुमको किसलिए खोजे ? पूर्ण का अर्थ ही यह होता है कि अब कोई खोज न रही , अब कुछ पाने को न रहा ।

सौभाग्यशाली हो कि नहीं मिली ।
नहीं तो अक्सर मिल जाती है ।

मुल्ला नसरुद्दीन अपने शिकार के अनुभव बता रहा था
खूब बढा़-चढा़ कर । बातों ही बातों में उसने यह भी कहा कि मैं अलग-अलग जानवरों को बुलाने के लिए विभिन्न  प्रकार की आवाजें निकालना जानता हूं ।  इससे शिकार करना आसान हो जाता है ।  जैसे हिरण को बुलाना हो तो एक विशेष प्रकार की आवाज करने से , आसपास जो भी हिरण हो वह भागा  चला आता है ।

एक मित्र ने पूछा : ' अच्छा यदि किसी शेरनी को बुलाना
हो तो कैसी आवाज करोगे ? ' मुल्ला ने झट चिंघाड़ते हुए एक खास किस्म की आवाज  निकाली , फौरन बैठकखाने का दरवाजा खुला और मुल्ला की बीबी गुलजान ने बाहर आकर कहा : ' कहिए , क्या बात है ? आज आप बहुत शोरगुल कर रहे हैं , बर्दाश्त के बाहर हुई जा रही है बात ! अब यदि जरा-सा भी हल्ला-गुल्ला किया तो कहे देती हूं , कच्चा निगल जाऊंगी ! '

तुम कह रहे हो प्रेम चैतन्य , कि मैं नौ साल से खोज रहा
हूं । काफी तपश्चर्या कर ली ।  नौ साल में तो नौ ही लोक पार कर जाते । नौ साल में तो नौ ही चक्र खुल जाते । नौ साल में तो सहस्रदल-कमल खुल जाता । और तुम प्रेमिका की तलाश कर रहे हो ! और ऐसी प्रेमिका , जो संसार और ध्यान एक बना दे ! मटियामेट कर देगी !

बडी़ कृपा है भगवान की तुम पर कि तुम तो खोज रहे हो ,
मगर नहीं मिल रही । पिछले जन्मों का पुण्य-कर्म होगा ।

अब तुम कह रहे हो कि आशीर्वाद दें कि मैं ऐसी प्रेमिका
पा सकूं और जब तक ऐसी प्रेमिका न मिले तब तक जबरदस्ती न करूं !

तुम क्या जबरदस्ती खाक करोगे !
कोई प्रेमिका जबरदस्ती न कर बैठे , वही डर है । अक्सर लोग सोचते हैं कि वे जबरदस्ती कर रहे हैं ; वे गलती में होते हैं । वे भ्रांति में होते हैं ।

मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी सुबह ही सुबह
नाश्ते पर बात कर रहे थे झगडा़ हो गया बातचीत में । पति-पत्नी में और होता ही क्या है सिवाए झगडे़ के ! मुल्ला की पत्नी ने कहा : ' एक बात का खयाल रखो , हमेशा तुम ही मेरे पीछे पडे़ थे , मैं तुम्हारे पीछे नहीं पडी़ थी । '

नसरुद्दीन ने कहा : ' वह बात सच थी ,
क्योंकि चूहादानी किसी चूहे के पीछे नहीं दौड़ती । चूहा खुद ही मूर्ख फंस जाता है । '

तुम क्या जबरदस्ती करोगे ? तुम्हें जबरदस्ती करने की
जरूरत ही नहीं आएगी । वह तो किसी स्त्री की नजर तुम पर पड़ गई .... तुम कैसे बच रहे हो नौ साल से , यह भी हैरानी की बात है । कुछ गुण होंगे तुममें । कुछ सदगुण होंगे कि स्त्रियां तुमसे बचकर निकल जाती हैं । नहीं तो तुम कभी के किसी के चक्कर में आ जाते , कोई न कोई तुम्हारी गर्दन पकड़ लेती । अब इतने दिन बच गए हो , धन्यवाद दो परमात्मा को !

और अब ध्यान की फिक्र करो , अब क्या प्रेमिका की फिक्र
कर रहे हो ! इतने दिन में तो क्या से क्या नहीं हो जाता ! क्या छोटी-मोटी बातें खोजनी ! और ध्यान के बाद अगर प्रेमिका मिल भी जाए तो खतरा नहीं है । ध्यान के पहले प्रेमिका मिल जाए तो बहुत खतरा है , क्योंकि ध्यान के पहले प्रेमिका मिल जाए तो फिर ध्यान न लगने देगी , खयाल रखना । तुम ध्यान करने बैठोगे तो वह हिलाएगी । अखबार नहीं पढ़ने देती , ध्यान क्या करने देगी । ऐसी चीजों में पड़ने ही नहीं देती ।

लोग घर से भागे रहते हैं , यहां-वहां भटकते फिरते हैं ।
देर-देर तक दफ्तर में बैठे रहते हैं । नहीं काम होता तो भी फाइलें उलटते रहते हैं । न मालूम क्या-क्या बहाने खोजते रहते हैं । किसी तरह घर से बच जाएं ।

तुम्हें ध्यान न करने देगी प्रेमिका ।
प्रेमिका तो किसी भी चीज से स्पर्धा ले लेती है । तुम अगर वीणा बजाओगे , वीणा तोड़ देगी । क्योंकि उससे प्रतियोगिता हो जाती है उसकी कि मेरे रहते और तुम्हारी यह कुवत कि तुम वीणा बजा रहे हो ! मेरे रहते और तुम विपस्सना में बैठे हो आंख बंद किए ! मेरे रहते और तुम अखबार पढ़ रहे हो ! मैं अभी जिंदा हूं , मर नहीं गई ! ध्यान मेरी तरफ दो , और कहीं ध्यान न ले जाना ।

तुम प्रेम चैतन्य , पहले ध्यान कर लो ,
फिर अगर कोई प्रेमिका मिल जाएगी तो ठीक होगा । पर ध्यान पहले संभाल लो , फिर प्रेमिका कुछ बिगाड़ न सकेगी । और ध्यान के बाद प्रेमिका मिलेगी भी तो ध्यानी को मिलेगी । और जो प्रेमिका किसी ध्यानी को पसंद करेगी , उससे शायद तालमेल भी बैठ जाए ।

मेरे हिसाब में तो प्रत्येक व्यक्ति को पहला काम ध्यान ,
फिर शेष अन्य बातें । जिसका ध्यान सध गया उसके  जीवन में शेष अपने-आप सध जाता है ।

आज इतना ही ।

ओशो
उड़ियो पंख पसार


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