फ़रवरी 03, 2019

बिकाऊ

मुल्ला नसरुद्दीन एक लिफ्ट में सवार हुआ। एक सुंदर महिला भी लिफ्ट में थी। दोनों ही थे। मुल्ला ने नमस्कार किया और कहा कि अगर दस हजार रुपए दूं तो एक रात मेरे साथ गुजारोगी? वह स्त्री एकदम नाराज हो गयी। उसने कहा, तुमने मुझे समझा क्या है? अभी लिफ्ट रोककर पुलिस को बुलाती हूं।
मुल्ला ने कहा, पुलिस वगैरह बुलाने की कोई जरूरत नहीं, बीस हजार दूंगा। महिला नरम हुई। मुल्ला ने कहा, जो मांगो——तीस, चालीस, पचास। गर्मी मुस्कुराहट में बदल गयी। स्त्री ने कहाः पचास! पचास हजार रुपए एक रात के! राजी हूं। मुल्ला ने कहाः और अगर पच्चीस रुपए दूं तो? तो स्त्री फिर भन्ना गयी। कहा, जानते हो कि मैं कौन हूं? मुल्ला ने कहा, वह तो हमने तय कर लिया; जब पचास हजार में राजी हो गयी, तो वह तो तय हो गया कि तू कौन है, अब तो दाम तय कर रहे हैं। अब पुलिस—मुलिस को बुलाने की कोई जरूरत नहीं है। पचास हजार में बिको या पच्चीस रुपए में बिको, क्या फर्क पड़ता है? वह तो तय हो गया कि तू कौन है? अब रह गयी दाम करने की बात, सो सौदा कर लें। सो आपस में निपटारा कर लें। पुलिस को बुलाने की क्या जरूरत है? पुलिस क्या करेगी इसमें? मुल्ला ठीक कह रहा है। तुम भी सोचना, कितने में बिक जाओगे? कितनी तुम्हारी कीमत है? कितनी ही कीमत हो, जो बिक सकता है उसने अभी आत्मा को नहीं जाना, क्योंकि आत्मा की कोई कीमत ही नहीं है। सारा संसार भी मिलता हो तो जिसने स्वयं को जाना है, वह बिकने को राजी नहीं हो सकता। यह सारा संसार रख दो तराजू के एक पलड़े पर और आत्मा को रख दो दूसरे पलड़े पर, तो भी आत्मा का तराजू ही भारी होगा। - # ओशो राम दुवारे जो मरे--(प्रवचन--03)